Friday, October 13, 2017

अलल बलल

मन:
ज्यादा कविता लिखने से
दिमाग कमजोर हो जाता है,
कामन सेन्स चुक जाता है
सच में !
अलल बलल कुछ भी छेरते रहना सृजन नहीं है।
कहा है किसी बड़े आदमी ने
"लेखन खून थूकने के समान है"

अ-मन:
तो आप अपने आप को काफ्का समझते हैं ?
आप लेखन का मानक तय करेगें ?
मूढ़ मति पापी मनुष्य ! 
वो जमाना गया ! 
रोज फेसबुक पर दो कविता ठेलो 
रात मूर्गे की गरम टांग के साथ 
ब्लेण्डर के दो पाग बढ़ाओ
रात में जम के सेक्स 
फिर सुबह 
गरीबों की चिन्ता 
देस समाज धरम करम की चिन्ता 
यही सृजन का सार है 
बाकी सब निराधार हा !

तथास्तु ! 



1 comment:

  1. अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर....आपकी रचनाएं पढकर और आपकी भवनाओं से जुडकर....

    कभी फुर्सत मिले तो नाचीज़ की दहलीज़ पर भी आयें-
    संजय भास्‍कर
    शब्दों की मुस्कुराहट
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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