Tuesday, August 22, 2017

असुर

कुछ लोग
अपने इसी जीवन के
एक हिस्से में
बन जाते हैं
मानव से असुर,
वैसे ही जैसे
शास्त्रों में वर्णित हैं
असुर
बड़े बड़े दांतो वाले
झबरैले बालों वाले।

वे बन जाते हैं असुर !
क्योंकि
उन्हें ठगा है देवताओं ने !
उनसे झूठ बोला है
देवताओं ने !

वे स्वर्ग पर
करतें है हमला
अप्सराओं के लिए नहीं
उसे तहस नहस करने के लिए !

Monday, August 21, 2017

झूठी आशा

कविता से
नहीं होगा कोई समाज सुधार
कोई क्रान्ति भी नहीं आयेगी
न ही भरेगा किसी भूखे का पेट !

कविता
बस
सब कुछ ठीक हो जाने की
झूठी आशा का
एक सिरा है !

जी लोगे बिना इसके ?

हे डीयर प्रभू !

From web











हे डीयर प्रभू !
कवि न बनने देना ऐसा
कि अपनी रचनाएं
पूरी होने से पहले ही, 
लपालप
मित्रों-मित्राणियों के
कपार पर 
खचाखच 
पटक पटक पूछूं …..
कैसी है कैसी है कैसी है !

हे डीयर प्रभू !
थोड़ी किरपा दे
लेना बचाय ! 

Sunday, August 20, 2017

घने जगंलों में



घने जगंलों में
मैं बहुत दूर निकल आया था ।
बहुत दूर ।
जगंलों के भीतर बहुत भीतर
बेतरतीब बिखरे खोये हुये उन रास्तों के पार
जिनपर कभी कोई पथिक गया ही नहीं
वहां आदमी के पास
अपने सीधे साधे जंगलीपन के गुल्म में लिपटी
नवजात धवल आदमीयता के अलावा कुछ और था ही नहीं,
वहां
घने अंधेरों के पार
मैंने प्यार और उजालॊं की बड़ी बड़ी खानें पायी
पाये निश्चल प्यार के चमकीले कौस्तुभ, 
स्पष्ट भावनाओं के हरे मरकत !
थे वहां नश्वरता की नीली रोशनी में
दमकते कुछ ऐसे फूल
जिनसें एक तरह की
न कही जा सकने वाली न समझी जा सकने वाली शाश्वतता लिए
भासित उज्जवल रक्तिम अभ्र झरता था !

बहुत सी पीले पन्नों वाली किताबों की कब्र से बाहर सरक आये
अनेक मिथकीय पात्रों भरी
सपनॊं , गल्पॊं व किंवदन्तियों की अनगिन झाड़ियां
जिनपर कवितायें बिखरी हुयी थी कहीं खिलकर सूख गये लाल टहकार फूल की तरह
तो कहीं किसी बहुत पुरानी साधारण सी कहानी में रोती हुयी लड़की के अन्तिम बूंद आसू की तरह !
इन सब को पार कर मैं
इन घने जंगलों में बहुत दूर निकल आया था !

यहां बादलॊं में प्रेम सघन घनत्व में
पानी की तरह पुता हुआ था ,
जो
सुन्न रात में 
चांदी के बुरादे जड़ी शुभ्र वस्त्र आवृत
प्रागऎतिहासिक मांसल प्रेम स्मृतियों सी
एक के पीछॆ एक , स्थगित सम्बध्दता लिये खड़ी
समुद्री नील पहाड़ियों व सम्मुख उसके
पुरिया धनश्री के गिरान वाले स्वर जैसी
एक गहरे गर्त-सी बजती
घाटी की कगार पर खड़े हो निहारते हुये
कभी आती सांस पर कभी जाती सांस पर
वैसे ही जम जाता है जैसे
प्रथम पुरुष के अधरों पर जम गये थे
प्रथम स्त्री के अधर प्रथम चुम्बन समय !

इस गहरी घाटियों में
पहाड़ॊं  की विमाओं को समझते हुये
मैं भटक गया था
एक ताजी आदमीयता की क्यारियों में उगने वाले 
बिलकुल अलग तरह से कोमल
बिलकुल अलग तरह से प्रगाढ़
सहज बोध भरे शान्त कर देने वाले
प्रांजल स्नेह सम्पुट धरे
आकाश के बहुत पास विहस आये
इन अद्भुत प्रतानों के जंगलॊं में
मैं बहुत दूर निकल आया था !

जापान और हम

कला संकाय के किले में शाम को कक्षाएं चलती थी जापनीज़ की।   चार बजे शुरू हो कर छह बजे तक। आकियो सर जो कि टोक्यो निवासी थे, हमें कांजी कतकना रटवाते थे।
पहले दिन जब कक्षाएं शुरु हुई तो परिचय से पहले ही आकियो सर ने हम सबसे एक काम कराया  । सबने अपना वो हाथ आगे किया जिस पर घड़ी होती है, फिर हम सबने अपनी घड़ियों में समय को एक किया। ठीक चार बजे। एक सप्ताह तक तो सब भारतीय तरीके से चलता रहा, लेकिन अगले सोमवार जब मैं चार बजके एक मिनट पर क्लास पहुँचा तो मुझे ससम्मान कक्षा से बाहर कर दिया गया। मैं तो भक्क रह गया! तब समझ आया कि चार बजे मतलब ठीक चार बजे।
लेकिन हमारी सालों की आदत तो दो दिन में छुटाए न छूटे, तो शान्तिपूर्वक हम पौने चार बजे हम रुम न ३२ के बाहर मौजूद रहते थे।
कक्षा में लगभग तीस विद्यार्थी थे। ज्यादातर  ध्यान से पढ़ते थे लेकिन कुछ महाशय थे जो पीछे बैठ चू चपड़ जारी रखते थे। शुरूआत के लगभग पन्द्रह दिनों तक आकियो सर ने कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ मुस्कुरा कर उन्हें चुप रहने की सलाह दी। लेकिन वो दिन आ ही गया जब उनके सब्र का बाध टूट गया। लगभग पाँच बज रहे थे। पूरे संकाय में सन्नाटा था। सिर्फ हमारी कक्षाएं चल रही थी। अचानक सर पूरी ताकत से चिल्लाए ! उनकी गुर्राहट इतनी तेज़ थी कि आवाज़ अहाते में गूजती रही।उन दो लड़को को खड़ा कर अपनी शुद्ध हिन्दी में सर फिर चिल्लाए ," तुम्हें पता है तुमने क्या किया है?" लड़के चुप। " तुमने दो मिनट बात की क्लास में, और तीस लोगों का दो मिनट बरबाद कर दिया। इस तरह तुमने अपने देश को साठ मिनट पीछे कर दिया....! "
हम सब शान्त। बात देश पर आ गयी तो सब गम्भीर हो  गए। बात ऐसी थी  कि सबको चुभ गयी। और इस तरह का यह अन्तिम वाकया रहा।
अगले साल आकियो सर ने बीएचयू में पढ़ाना छोड़ दिया।वो राजस्थान में फिल्माई जा रही किसी जापनीज़ डाक्यूमेन्ट्री फिल्म निर्माण में सहयोग देने चले गए। अब उनकी पत्नी कक्षाएं लेती है।साथ ही  रवीन्द्रपुरी में शीबा रेस्त्रां भी चलाते हैं पति पत्नी।
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जापान के स्मार्ट शहरों से प्रेरणा लेने से पहले हमें जापान के लोगों से बहुत कुछ सीखना होगा। अगर हम उनसे थोड़ा सा "सिविक सेन्स" सीख लें, तो हमारे शहर अपने आप ही स्मार्ट हो जाएगे।

आज की सांझ

पिघले सोने की भट्टी
डूब खो गयी
स्याह नीलाभ घाटी के
गर्भ में,
आज की सांझ।

Thursday, August 17, 2017

कुछ शब्द


ढूंढता हूं
कुछ शब्द
छुपा सकें जो
गहरे
मेरे सन्नाटों को !
रच सकें जो
ऐसी कोख
जिसमें दफ्न हो
सकूं मैं !
कह सकें
वे वह कुछ
जो कहा नहीं
जाना है


Sunday, July 30, 2017

आजकल


हर तरफ धूल है
धुँआ है
गुबार है।

गर्द इतिहास की
चुभ रही है
पलकों में।

वर्तमान का पानी
धुले
स्पष्ट कर दे
सब गर्द
हालाकिं
वह खुद ही
धुंधला है
गंदला है।

ज्ञान गुप्त रोग सा
बढ़े है
दिनों दिन ,
अपने ही निस्तारण
में प्रयासरत,
अपंग, निष्प्रभ !

आजकल ,

Saturday, July 1, 2017

फोन

चलो . . . ! ! !
थोड़ी देर . . .
साथ रहें !
एक दूसरे को फोन करें
 और...
 हैलो भी ना बोलें ।

बहुत देर तक
चुप रहें . . .
और बिना  कुछ कहे
हल्की सी सांस छोड़
फोन रख दें ।

इतनी दूर होकर भी
चलो . . .! ! !
थोड़ी देर
साथ रहें !