Monday, April 27, 2009

आदतन


मन भी कितनी अद्भुत चीज है ! इसकी तो माया ही निराली है ! बिलकुल एक छोटे चंचल बच्चे सा हठी , उद्धत, व मूलतः निश्छ्ल ! किसी भी ऐसे मामले में जहां थोड़ा सा भी सुख या आनन्द मिलने की संभावना हो वहां यदि मेरी हां तो इसकी ना ! ! यदि मेरी ना तो इसकी हां ! ! मैं कहूं छोड़ दो तो वह कहे ले लो ! ! मैं चाहूं कि ले लूं तो वह बोले अब छोड़ो भी !!! मतलब बहुत कम ही ऐसे शुभ व मंगलमय अवसर आते हैं जब दोनों की हां एक साथ होती है ।
वैसे मन एक अच्छा लड़का है । वह बुरा नहीं है । किताबों की बहुत सारी बातें पूरी तरह ठीक नहीं है । बहुत बार वह हमें बस “आदतन” परेशान करता है । हमसे विपरीत जाने में, हमें परेशान करने में, व्यवस्थित चीजें बिखेरने में, तोड़—फोड़ करने में, बेमतलब के उपद्रव रचने में, इधर उधर कूदने फांदने में बहुत बार उसे भी वस्तुतः कोई मजा नहीं आता । लेकिन फिर भी वह यह सब करता रहता है बस आदतन । गति तो उसका स्वभाव ही है !किन्तु दौड़ने के लिये पटरी के रूप में वह आदतॊं को उपयोग में लाता है । और निस्संदेह ही आदतों के बननें या बिगड़ने की जिम्मेदारी तो हम पर ही है ।
अनायास एकदा कहीं पर मन को कुछ सुख मिल जाता है । फिर वह उस सुख को सायास दोहरना चाहता है । बार बार उधर ही दौड़ता है ।किन्तु बहुत ही कम बार ……या लगभग नहीं ही.....वह दुबारा उस अप्रत्याशित सुख को पकड़ पाता है………तथापि आदतन दौड़ता ही रहता है……..उस प्रथम सुख की एक मात्र स्मृति को कसकर धरे हुए।

Wednesday, April 22, 2009

गौरैया के बच्चे

दोपहरी सन्नाटे में अकेले अपने रूम मे बैठा कुछ कर ही रहा था की लाइट चली गयी ! एक गहरी सांस ले धीरे से सब काम किनारे रख सम्मुख की खिड़की खोली मैंने । बाहर बेल का पेड़ आज की इस दुपहर में भी वैसे ही बालकनी में आधा झुका हुआ अपनी नयी आयी पत्तियों से बातें कर रहा था । उन्हें बता रहा था कि कैसे कड़ी पीली धूप को मीठे मद्धम-से हरे प्रकाश में बदल खुद से अनवरत बहाना है ।
मन में कुछ यूं ही बेमतलब की करने को सूझी तो बालकनी में किनारे के सब छेद मूंद खूब अच्छे से पानी भर दिया । सोचा धूल भी नहीं आयेगी ठण्ड भी रहेगी ।
लेकिन थोड़ी ही देर में इससे कुछ और भी हुआ । अप्रैल की इस दुपहरी में जब यहां बनारस में पारा ४४ के पार पहुंच रहा है, लू चलने लगी है और तपन शुरू हो गयी है, सामने के बिल्व वृक्ष पर उछलते-फुदकते चिड़ियों के कई झुण्ड जुट आये !
गौरयों के झुण्ड ,जिनमें कई बच्चे थे ! छोटे –छोटे बच्चे !! प्यारे प्यारे बच्चे !! लाल लाल मुंह वाले बच्चे !! अपने चिड़ियापन की समग्र निश्छलता को सहज ही अपनी ट्विक- ट्विक टिमकन-सी बोली में अभिव्यक्त करते भोले भाले बच्चे !! पूरे विश्वास व बड़ी तत्परता से इधर उधर निहारते चंचल बच्चे !! फुदक फुदक कर पानी पीते , प्यास बुझाते टुइंयां से बच्चे !! गौरैया के बच्चे !!!
कभी वे खुले दरवाजे से बिलकुल मेरी मेज के पास आ जाते ! कभी सामने की खिड़की की राड पकड़ तिरछे लटकते ! फिर पानी पीते ! जड़वत बैठा मैं सम्मुख हो रहे इस तृप्ति उत्सव को मग्न देखता रहा ! प्रसाद स्वरूप उतफुल्लता वातावरण में अगरबत्ती के धुयें सी बिखरती रही ! गौरैया के लाल मुंह वाले छोटे बच्चे पानी पीते रहे और मेरी प्यास बुझती रही !

Friday, April 17, 2009

श्श्श्श...चुप !!

1.
. . . .श्श्श्श्श्श्श्श्श . . .चुप ! ! ! !
घात लगाये ,
छत मुड़ेर पर,
अभी
टिकुरी बैठी है बिल्‍ली . . .. . .।


2.
शोर न करो,
धीरे धीरे आओ
छत पर फैला गेहूं
कुचुर कुचुर खा रही है
सजग गिलहरी ।

Monday, April 13, 2009

क्षणिकाए

(1)
मैं बना गर्भ
पालता बीज
तुम्हारे प्रेम का ।

(2)
खूशबू से पूछो
पता
फूल के दर्द का ।


(3)
घोंसले में थकी सोयी है
चिड़िया । सूरज !
रुको अभी थोड़ी देर !

Saturday, April 11, 2009

शब्द

(मेरी) कविता के शब्दों में
तुम
अर्थ न खोजना, उसकी व्याख्यायें न करना ।
केवल उच्‍चरित करना ,
उन्हें धारण करना और चुप हो जाना ।

वे बस शब्द नहीं हैं ।
वे दूत हैं ।
दूत-बहुत सूक्ष्म जीवधारी , तरंगायित आवृत्ति निर्मित देह वाले ।
आवृत्ति-चेतना के होने का एक ढ़ंग , गतिशील इसलिये अशंतः अभिव्यक्त ।
खैर,
तुम
उन्हें उच्‍चरित करना और चुप हो जाना ।
तुममें प्रवेश कर
वे तुम्हें अपने साथ कहीं ले जायेंगें ।
कहीं-किसी दूसरी जगह पर, अन्यत्र ।

हो सकता है
वो जगह उन्हें कहीं तुम्हारे भीतर ही मिल जाय
और वे तुम्हें वहां पहुंचा
(मुझमें) वापस लौट आयें ।

या हो सकता है
कि उस जगह की खोज में
वे कहीं तुम्हें तुमसे बाहर ले जांय ।
कहीं -स्थान व स्थिति के किसी दूसरे कोण व विमा में ,
और वहां घुमा दिखा
तुम्हें तुममें वापस छोंड़ने के
बाद
(मुझमें) वापस आयें ।

हो सकता है ! ,! ,! ,
लेकिन तुम उनमें अर्थ न खोजना, व्याख्या न करना ।
बड़े अच्छे हैं वे दूत ,
अपना काम कर लेंगें ।

Thursday, April 9, 2009

वो लड़की है....

आज सात साल बाद मिला था उनसे । अब वो बड़ी हो गयी हैं । वो लड़की हैं । वो बोलती और हंसती भी हैं । वो लोगों को देखकर मुस्कराती हैं और बातें करती हैं । कुछ दिन शहर में रही हैं । इतना तो आ ही जाता है । अब उनकी शादी होने वाली है । होने वाली से मतलब पक्की हो गयी है ।
पक्की हो गयी है से मतलब कि अब एकदम पक्की हो गयी है । वो क्या है की इसके पहले भी एक बार पक्की हुयी थी । लड़का “जाब” और “पैकेज” वाला था । धनी था । “संस्कारित” था । एक दो बार घर भी आया । बातचीत भी की । इसी दौरान उनकी —जो अब बड़ी हो गयी हैं और लड़की हैं —की एक पुरानी एलबम में दोस्तों के साथ की (एक बहुत ही सहज सी) फोटो देख ली.........!
आज जिस मन्दिर में उनकी सगायी की रस्म होने वाली है वहीं उसने उन्हें अकेले मिलने के लिये बुलाया था । तब तक घर वालों को कुछ भी पता न चला था । सब खुश थे । चाचा जी मन्दिर तक छोड़ने आये थे उनको ।
शुरुआत की एक दो अच्छी बातों के बाद उसके असहज स्पर्शन को स्वप्नों का आलिंगन ही समझा था उन्होंने । बहुत देर तक भी समझ न सकी थीं वो कि उसने सादे कागज पर जबरन इनके हस्ताक्षर क्यों लिये । क्योंकि तभी उसने बताया था की वह उनसे शादी नहीं करेगा । उन्हें बरबाद करके छोंड़ेगा........ ।
बाद में यह दूसरा रिश्ता पक्का हुआ । तैयारियां हो रही थी घर पर । तभी अचानक एक दिन मुहल्ले में हल्ला हुआ कि मनीषा की शादी तो एक बार हो चुकी है......पुराने दुल्हे के पास कागजात हैं..... !
...पापा के सीने में बहुत तेज दर्द हुआ था ....चाचा का सारा गुस्सा मन्नों पर ही उतरा था.....दीवाल से टकराकर सिर फट गया था...!
आज सगायी के दिन भी जख्म पूरा सूखा नहीं है....सब वैसे ही हो रहा है जल्दी जल्दी । सबकुछ जानने के बाद दुगने दहेज पर फिर से तैयार हुये हैं वे ।

Tuesday, April 7, 2009

अक्षर

मैं
अपना जीना
अपना होना
अपनी तृप्त अतृप्त आकाक्षांए
अपने द्वेष अपनी प्रसन्‍नताएं
और इन सब को मिलाकर
जो बिलकुल मैं हूं वह
थोड़ा थोड़ा रोज रोज
शब्दों को देता जाता हूं ।

हांलाकि शब्द फिर से
पूरा पूरा ,दुबारा ,कहीं
किसी से भी ,ठीक वैसा ही
नहीं कह पायेगें मुझे
लेकिन
शायद
अपनी अक्षरता में सतत गतिशील
अपने साथ वे
एक दो कन मुझे भी
अक्षर कर जायेंगे ।

Saturday, April 4, 2009

चाहना और होना

चाहने और होने में बहुत अन्तर है !

बहुत कम ही यह होता है कि
“चाहना” “होने” की तरफ पहला कदम हो!

अक्सर चाहना अपने जनमने के कुछ समय बाद ही
आंसू गैस के एक गोले सा फटता है
और यथार्थ में ही कुछ ऎसा घोल देता है
कि उसकी यथार्थता लगभग समाप्त हो जाती है ।

हम एक आभास को ही सच मान लेते हैं
क्योंकि तब तक यह चाहना
हमें अपने उस अन्तिम होने का
एक सुन्दर व सस्ता विकल्‍प दे चुका होता है !