Sunday, February 11, 2018

समय के जाले

#ध्यान कविता
Paul Bond Fine Art

मकड़ी जैसे
निहारती है कभी कभी
अपने बुने जाले के किनारे जा कर
बाहर बिछी हवा की चट्टानें
वैसे ही मैं
यदा कदा
बहुत धीमी सांस
चढ़ आता हूं अपनी बुनी
अन्धेरे की दीवार पर
देखता हूँ उस पार, डरा सहमा
समय की ठोस बिखरी हुई चट्टानें
कल, आज, भविष्य, बहुत पहले, बहुत बाद
सब
यहां वहां पड़े रहते हैं
टुकड़ो टुकड़ो में धूल खाते!

समय की चट्टानें मोम की बनी होती हैं!

Wednesday, November 22, 2017

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